Saturday, 23 March 2013

छान्दोग्य उपनिषद 3.15

1. वह कोष जिसका उदार अंतरिक्ष है, जिसका मूल पृथ्वी है, जो कभी जीर्ण नहीं होता। दिशायें इसके कोण के रूप में है, आकाश इसका ऊपर का छिद्र है। वह कोष वसुधान है उसी में सम्पूर्ण विश्व अवस्थित है। 

3. मैं परिवार सहित अक्षय कोष के आश्रय में जाता हूँ, प्राणमय कोष के आश्रय में जाता हूँ , भू ः  अर्थात मनोमय कोष के आश्रय में जाता हूँ, भुवः अर्थात विज्ञानमय कोष के आश्रय में जाता हूँ , स्वः अर्थात आनंदमय कोष के आश्रय में जाता हूँ। 

4. जब हमने कहा की हम प्राण के आश्रय में हैं, तो इसका आशय यह है की ये सम्पूर्ण भूत ( तत्व ) प्राण ही हैं, हम उसी के आश्रय में हैं। 

5. जब हमने कहा की हम भू ः के आश्रय में हैं तो इसका आशय है की हम पृथ्वी का आश्रय में हैं, अंतरिक्ष के आश्रय में हैं, धुलोक  के आश्रय में हैं। 

6. जब हमने कहा की हम भुवः के आश्रय में हैं, तो इसका आशय है की हम अग्नि के आश्रय में हैं, वायु के आश्रय में हैं, वायु के आश्रय में हैं, आदित्य के आश्रय में हैं। 

7. जब हमने कहा की हम स्वः के आश्रय में हैं, तो इसका आश्रय यह है की हम ऋग्वेद के आश्रय में हैं, यजुर्वेद के आश्रय में हैं, सामवेद के आश्रय में हैं। 

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