Saturday, 2 March 2013

छान्दोग्य उपनिषद 5.1

1. जो ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ को जानता है वही ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ  है. निश्चय ही प्राण ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ है. 
2. जो वसिष्ठ को जानता है वही स्वजनों में वसिष्ठ होता है. निश्चय ही वाणी वसिष्ठ है. 
3. जो प्रतिष्ठा को जानता है वह लोक परलोक में प्रतिष्ठित होता है. निश्चय ही चक्षु प्रतिष्ठा है. 
4. जो सम्पद को जानता है उसे दैव और मानुष दोनों ही काम  प्रकार से प्राप्त होते हैं। श्रोत्र ही सम्पति है. 
5. जो अयातन को जानता है वह स्वजनों का अयातन होता है अर्थात  आश्रय बन जाता है, निश्चय ही मन अयातन है. 

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