Saturday, 11 May 2013

yog darshan - 1

चित वृत्तियों का सर्वथा रुक जाना अथवा नियंत्रित हो जाना योग है 
दृष्टा का उस समय अपने स्वरुप में स्थिति हो जाती है. 
दूसरी अवस्था में दृष्टा वृत्तियों के सामान रूप वाला प्रतीत होता है. 
वृत्तियाँ पांच तरह की हैं क्लिष्ट और अक्लिष्ट ( दुःख की उत्पादक और दुःख का विनाश करने वाली )
प्रमाण, विपर्यय , विकल्प निद्रा और स्मृति 
प्रत्यक्ष अनुमान और आगम , प्रमाण हैं 
जो इस पदार्थ के रूप में प्रतिष्ठित   है,इस प्रकार का झूठा ज्ञान विपर्यय है 
जो शब्द ज्ञान के अनुसार  उभरती है, ऐसी  चित वृत्ति जो विषयगत वस्तु  से शुन्य हो  विकल्प कहलाती है. 
जो वृति अभाव  के ज्ञान का अवलंबन करने वाली है वह निद्रा कहलाती है. 
पहले अनुभव किए  विषय का छिपा न रहना स्मृति कहलाती है. 
उनका निरोध अभ्यास और वैराग्य से होता है. 
चित की स्थिरता के लिए जो प्रयास किया जाता है उसे अभ्यास कहते हैं 
किन्तु वह अभ्यास लम्बे समय तक निरंतर और सत्कारपूर्वक अंग उपांग से सेवित होने पर दृढ स्थिति वाला होता है 
देखे हुए अथवा सुने हुए  विषयों में जो पूर्णरूपेन तृष्णा रहित है , ऐसे चित की वशीकार संज्ञा ( अवस्था ) को वैराग्य कहते हैं 
पुरुष के ज्ञान से  प्रकृति के गुणों में तृष्णा का पूरी तरह अभाव हो जाना परम वैराग्य  है 
वितर्क  विचार आनंद एवं  अस्मिता इनके अनुगम सहयोग अथवा  सम्बन्ध से सम्प्रज्ञात समाधि  स्थिति आती  है 
जिसकी पूर्व अवस्था विराम प्रत्यय का अभ्यास है तथा जिसमें  चित की स्थिति मात्र  संस्कार  स्वरुप ही     शेष बचती है उसे असम्प्रज्ञात समाधि कहते  हैं 
 भव प्रत्यय नाम वाली ( असम्प्रज्ञात समाधि ) विदेह और प्रकृतिलय  वाले योगियों की होती है 
 श्रद्धा , स्मृति ,  वीर्य , समाधि और प्रज्ञापूर्वक क्रम से अन्य  साधकों को असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति होती है 

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